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भाई चलो ना साथ रहते है , घर क्यूँ बाटते हो.....

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भाई चलो ना साथ रहते है , घर क्यूँ बाटते हो.
हमेशा से हम करीब  थे,आज ये डोर क्यूँ काटते हो.
अभी अभी तो खुद का घर मिला है ,
चलो मिलकर सजाते है.
बिना किसी डर के  छत पे आज ,
वन्दे मातरम गाते है....
हमेशा से एक इच्छा थी मेरी ,
की तुम मुझे गज़ले सिखाओगे ...
मैं तुम्हे खीर खिलाऊंगा और,
तुम मुझे सेवैयाँ खिलाओगे.....
 नाराज़ हो? चलो मान जाओ...
ज़रा सुनो...
मुझे अच्छा लगता है,जब तुम डांटते हो....
भाई चलो ना साथ रहते है , घर क्यूँ बाटते हो..
हमारी सोच एक है,
संगीत  एक है...
शब्द एक है,
आज़ादी की जीत एक है....
तुम मेरे अस्फाक और ,
मैं तुम्हारा भगत बनकर,
चलो कल का मुल्क बनाते है..
छोडो ना , जाने दो.
दिवार पर अलग होने के ये पर्चे क्यूँ साटते हो.
भाई चलो ना साथ रहते है , घर क्यूँ बाटते हो..... 








शरहद पार के पडोसी ....

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शरहद पार पडोसी ख़फ़ा है, ज़मीन के एक टुकड़े के लिए,
जो कुछ बरस पहले तारा था , कुछ बरस बाद तारा होगा,
ना कभी हमारा था, ना कभी तुम्हारा होगा.
ज़रा ठहरो और सोचो,
की दोनों और....
काला अँधेरा आधी रोटी और हालत बेहाल है,
वक़्त की इस चादर में फिर भी एक धागा लाल है.
लाल लहू उस लड़के का , जिसका यौवन बस गुजर गया.
लाल लहू उस लड़की का, जिसका सिन्दूर उजड़ गया.
लाल लहू उस बच्चे का,जिसने चलना बस सिखा था.
लाल लहू उस मेहँदी का, जिसका रंग अभी भी फीका था.
कभी ख़ुदा, कभी ज़मीन के नाम पर, कितने मरे ,कितने जिये.
शरहद पार पडोसी ख़फ़ा है, ज़मीन के एक टुकड़े के लिए..... 

Nitin Jain. (No copy Rights ). Powered by Blogger.

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