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प्रेम का वो राग
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उस राग की चाह ना थी,पर साज़ कुछ ऐसा बना.
की गीत खुद ही बन उठे और बन उठा प्यारा समां.
अब मौन मेरा झूम कर,गीत नया ये गता है.
बहती पवन वीणा बजती ,फिर मेघ गुनगुनाता है.
कल-कल बहती उस नदी का कैसा मादक श्रृंगार है.
न आर है ना पार है,न ये राग मल्हार है.
धक-धक धड़कता हृदय अब कर रहा है अनमना.
उस राग की चाह ना थी,पर साज़ कुछ ऐसा बना.
हर रात लम्बी.दिन तनिक सा.
चल रहा मैं एक मस्त पथिक सा.
सनसनाती वो हवाए जब कानो को छू जाती है.
तब कहीं वो दिवानी मीरा याद आती है.
उस अदृश्य प्रेम की सुन्दरता ,भला कौन करता है मना
उस राग की चाह ना थी,पर साज़ कुछ ऐसा बना.
आकाश का है रंग इसका,कैसे इसे विस्मृत करें.
चाहे रिक्तता हो,या हो मस्जिद या चाहे हो शिवाला.
चाहे प्रेमिका की गोद हो,या भले हो भरी मधुशाला.
ब्राम्हण की अनंता में,कण-कण इससे है सना.
उस राग की चाह ना थी,पर साज़ कुछ ऐसा बना.
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